सगुण तत्त्व

जगत और जीवन सदा से धर्म एवं दर्शन की समस्या हैं । यह जो कुछ संसार दीखता है, क्या है? क्यों है ? इसका आधार, कर्त्ता, प्रेरक कौन है ? कैसा है ? साथ ही हमारा अपना जीवन – हम स्वयं क्या हैं ? क्या उद्देश्य है इस जीवन का ?

जगत को हम अपनी ज्ञानेन्द्रियों से जैसा देखते हैं, वह वैसा ही है या नहीं - कोई उपाय यह जानने का नहीं है । सब प्राणी जगत को ऐसा ही नहीं देखते ।

जन्मान्ध के लिए रूप का – रंगों का अस्तित्व ही नहीं है। ऐसे ही जिन प्राणियों में घ्राणेन्द्रिय या श्रवणेन्द्रिय नहीं है, उनके लिए गन्ध अथवा शब्द नहीं है।

इन्द्रियों की शक्ति बाह्य साधनों से अथवा योग से बढ़ायी जा सकती है; किन्तु अन्तत: जगत के देखने का माध्यम इन्द्रियाँ ही रहेंगी ।

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