भगवान वासुदेव



भगवान वासुदेव 
कृष्ण ! तुम्हारे गुण चरितों की कहाँ कहीं कुछ मिति है ।
किन्तु – बुद्धि की , मन की , कर की शक्ति सदा सीमित है ।।
नन्हा मत्स्य अनन्त सिन्धु की सीमा क्या पायेगा ।
किन्तु सिन्धु का अङ्क त्यागकर भला कहाँ जायेगा ।।
मीन रहें मन-बुद्धि तुम्हारे चरित-गुणों के रस के ।
इनका पार भला क्या पाना – ये वाणी के बस के ?
रस सागर ब्रजराज-तनय तुम सदा सदा के जन के –
रहे, रहो प्रिय प्राण प्राण के – जन तव, तुम निज जन के ॥
सानुकूल तुम रहो, शारदा सानुकूल कल्याणी ।
सानुकूल गणनाथ सफल हो साङ्गपूर्ण यह वाणी ॥

Comments